भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Awadhi Sahitya-Kosh (Hindi-Hindi) (LU)

Lucknow University

सेवा राम

ये १९वीं शताब्दी के अवधी कवि हैं। इन्होंने सं. १९५३ से पूर्व ‘नल-दमयंती-चरित’ नामक अवधी ग्रंथ का सृजन किया था।

सैयद राजन

रायबरेली निवासी राजन एक अच्छे अवधी साहित्यकार हैं। इनकी रचनाएँ समाज को गति-मति प्रदान करने में सहायक है।

सोनेलाल द्विवेदी ‘लतनेश’

द्विवेदी जी मौरावाँ जिला उन्नाव के निवासी थे। ये बैसवाड़ी अवधी के कुशल रचनाकार थे। समस्यापूर्ति आदि इनकी कविताओं के विषय रहे हैं। ३०-३२ वर्ष की अल्पायु में इनका असामयिक निधन हो गया।

सोम दीक्षित

१ जुलाई १९४९ ई. को सीतापुर जनपद के ग्राम रिखौना में इनका जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सुन्दर लाल दीक्षित है। हिन्दी में एम.ए. करने के उपरांत समाज सेवा को इन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। ये हिन्दी सभा सीतापुर के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। छन्दोबद्ध रचनायें सोम दीक्षित की अधिक प्रिय है। ये अच्छे छन्दकार-सवैयाकार हैं। इनकी अवधी में बैसवारी का भी पुट मिलता है।

सोहर

यह जन्मोत्सव पर गाया जाने वाला अवधी मंगलगीत है। डा. कृष्णदेव उपाध्याय ने इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘शोभन्’ से मानी है। सोहर गीतों में ममता, वात्सल्य भाव और आशा का बीज विद्यमान रहता है। इस गीत की परपंरा प्राचीन है। प्राचीन सोहर गीतों में पुत्र-जन्म सम्बद्ध भावों को ही उजागर किया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य चिन्तन को स्थान नहीं मिला है। किन्तु आधुनिक युग में समकालीन चिंतन को ध्यान में रखते हुए समेट लिया।

सोहाग

विवाह लग्न के पूर्व कन्या के सौभाग्य-सुख के लिए स्त्रियों द्वारा गौरी-वन्दना करते हुए इस अवधी लोकगीत का गायन किया जाता है।

स्वराज्य बहादुर सुमन ‘सुल्तानपुरी’

इनका विवरण अप्राप्त है, किन्तु इन्होंने निःसन्देह अवधी साहित्य की बहुत सेवा की है।

स्वामी अग्रदास

ये तुलसीदास के समकालीन ‘भक्तमाल’ के लेखक नाभादास के गुरू थे। इनका आविर्भाव काल सं. १६३२ माना गया है। इनके दो अवधी ग्रंथ- ‘कुण्डलिया रामायण’, ध्यान मंजरी’ उल्लेख्य हैं।

हंस जवाहर

यह काव्यकृति सूफी कवि जान कवि द्वारा रचित है। सूफी प्रेमाख्यान काव्य परम्परा से सम्बद्ध यह कृति मसनवी शैली से ओत-प्रोत है। इसकी भाषा अवधी है, जो इसके माध्यम से अत्यन्त गौरवान्वित हुई है। मिश्र बन्धुओं के अनुसार इस कृति का रचना-काल सं. १९०० वि. है।

डॉ. हनुमानदार ‘चकोर’

चकोर जी का जन्म सन् १९३३ में हरदोई नगर के एक वैश्य कुल में हुआ था। कानपुर देहात जनपद के पुखरायाँ डिग्री कालेज में प्राध्यापक भी रहे। अवधी में दोहा तथा बरवै लिखने में बड़े कुशल थे। मृत्यु के समय ‘गाँधी सतसई’ लिख रहे थे, जो अधूरी रह गई। १९६० ई. में अल्पायु में इनका निधन हो गया।

हनुमान शरण ‘मधुर आलि’

ये रसिक सम्प्रदाय के रामभक्त कवि रहे हैं। इन्होंने अवधी भाषा में ‘रामदेहावली’ नामक रचना सृजित कर अपना साहित्यिक योगदान प्रकट किया है। इस रचना का सृजन सन् १८८७ में हुआ था।

हनुमान-स्तुति

यह संत जगजीवन साहब कृत स्‍तुतिपरक अवधी रचना है। इसी नाम से नेवाजदास जी ने भी अपनी अवधी कृति प्रस्तुत की है।

डा. हरदेव बाहरी

बाहरी जी दरभंगा कालोनी, इलाहाबाद के निवासी हैं। इन्होंने अवधी साहित्य के सम्मान में काफी योगदान किया है। श्री रामाज्ञा द्विवेदी ‘समीर’ के ‘अवधी कोश’ को आगे बढ़ाते हुए इन्होंने ‘अवधी शब्द-संपदा’ नामक संकलन का संपादन कर अवधी साहित्य को समृद्ध करने की कोशिश की है। सम्प्रति काफी कार्य कर भी रहे हैं।

हरभक्त सिंह पँवार

सन् १९४० में जनमे बहराइच निवासी पँवार जी अवधी सेवी के रूप में जाने पहचाने जाते हैं। इनकी सेवा अवधी साहित्य के परिवर्द्धन में सहायक सिद्ध हुई है। इनकी अवधी रचनाएँ जनसामान्य एवं गाँव की धरती से जुड़ी हुई हैं। पारस भ्रमर इनके प्रेरणा-स्रोत हैं। इनका व्यवसाय अध्यापन कर्म रहा है।

हरि कवि

इनका मूलनाम हरिचरणदास त्रिपाठी था। इनका जन्म सम्वत् १७६६ सारन (बिहार) जिले के चैनपुर ग्राम में हुआ था। इन्होंने ‘बिहारी सतसई’ पर टीका लिखी थी। इसके अतिरिक्त इनका एक स्फुट छंद-संग्रह भी मिलता है। इनकी रचनाओं में विशुद्ध अवधी का प्रयोग हुआ है।

डा. हरिकृष्ण अवस्थी

४ सितम्बर १९१७ को हरदोई जनपद में जनमे डा. अवस्थी अपने परिवेश के प्रति बाल्यकाल से ही जागरूक थे। इनका व्यक्तित्व बहुआयामी है ये साहित्य, राजनीति, शिक्षा, प्रशासन सभी से जुड़े रहे। सन् १९४२ के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में डा. अवस्थी ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया, जिससे इन्हें कठोर कारावास का दण्ड मिला। उच्च शिक्षा प्राप्त कर १९४६ में, हिन्दी विभाग लखनऊ विश्व विद्यालय में प्रवक्ता पद पर इन्होंने कार्य प्रारम्भ किया और १९७६ में यहीं विभागाध्यक्ष हो गए। १९७८ में सेवा निवृत्त हुये। तत्पश्चात लखनऊ वि. वि. के कुलपति बने। सन् १९५५ से १९९६ तक ये पूर्वी अध्यापक निर्वाचन क्षेत्र और लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद् के सदस्य रहे हैं। इस अवधि में विभिन्न संस्थाओं में सक्रिय रहे तथा अनेकानेक उपाधियों-सम्मानों से अलंकृत हुये। अवधी के प्रति किये गये महत्वपूर्ण कार्यों में इनकी सेवायें उल्लेखनीय है। पं. वंशीधर शुक्ल का पाठ्यकम में प्रवेश इनके अवधी-प्रेम का अपूर्व उदाहरण है। इनके निर्देशन में शोधकार्य की पहल हुई। इन्हीं की प्रेरणा से लखनऊ विश्वविद्यालय में अवधी परिषद् की स्थापना हुई थी।

हरितालिका प्रसाद

ये द्विवेदी युगीन अवधी कवि हैं। विशेष रचना दे सकने में भले ही प्रसाद जी सफल नहीं हो पाये, किन्तु अपने समय में अवधी काव्यधारा को जीवित रखने में अवश्य सफल रहे।

हरिदत्त सिंह

ये अलऊपुर, फैजाबाद के निवासी एवं अवधी कवि हैं।

हरिदास

हरिदास का पूर्वनाम हरिसिंह था। ये डीडवाणा (राजस्थान ) के निवासी थे। कहा जाता है कि ये गोरखनाथ जी के शिष्य थे। हरिदास का जीवन-वृतांत प्रमाण पुष्ट नहीं है। यों तो इनका स्थितिकाल आदिकाल से संबद्ध है। इनकी रचनाओं में पर्याप्त अवधी प्रयुक्त हुई है।

हरिनाथ शर्मा

शर्मा जी सीतापुर के बदैयाँ क्षेत्र के निवासी हैं। इन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में अवधी भाषा को अपना केन्द्र बिन्दु बनाया है। अतः इनका अवधी प्रेम सराहनीय है।

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