भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Awadhi Sahitya-Kosh (Hindi-Hindi) (LU)

Lucknow University

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आखत

यह एक अवधी पत्रिका है, जिसका प्रकाशन ‘अवधी मंच’ के माध्यम से हो रहा है। दो अंकों में प्रकाशित होकर इस पत्रिका ने अवधी साहित्य में काफी योगदान किया है।

आखिरी कलाम

यह मलिक मोहम्मद जायसी की महत्वपूर्ण रचना है। इसमें अवधी भाषा एवं दोहा -चौपाई, छंदों का सफल प्रयोग हुआ है।

आतमदीन

इनका अवधी साहित्य के परिवर्द्धन में पर्याप्त योगदान रहा है। इन्होंने अपनी लोक कथाओं तथा लोकोक्तियों के माध्यम से अपने जीवन के अनुभवों को पद्यबद्ध किया है। साहित्य में अति सामान्य जीवन को इन्होंने अपना विषय क्षेत्र बनाया है।

आदित्यप्रसाद अवस्थी ‘दिनेश दादा’

सीतापुर जनपद के दौली नामक गाँव के निवासी अवस्थी जी अपनी अवधी रचनाओं के लिए प्रख्यात हैं। इनका जन्म २४ जुलाई सन् १९३७ को हुआ था। हास्य-व्यंग्य इनके लेखन का मुख्य क्षेत्र है। महमूद फूफा, खटमल चालीसा, मूंछे, डकैत आदि तमाम इनकी अवधी रचनाएँ हैं।

आदित्य वर्मा

वर्मा जी का जन्म गोण्डा जनपद में हुआ था। इन्होंने ग्राम्य जीवन एवं सम-सामयिक विषयों को अपनी लेखनी के माध्यम से चित्रांकित करने का उपक्रम किया। ’भरत’ इनका प्रसिद्ध अवधी खण्ड काव्य है।

आद्याप्रसाद मिश्र ‘उन्मत्त’

प्रतापगढ़ में जन्मे उन्मत्त जी उच्चकोटि के अवधी साहित्यकार हैं। इन्होंने अवधी भाषा को उत्कृष्ट साहित्य प्रदान किया है। मिश्र जी खड़ी बोली में भी साधिकार लिखते हैं। ये मंच के भी सफल कवि हैं। व्यवसाय से मिश्र जी अधिवक्ता हैं। किंतु मूलतः एक साहित्यकार और पत्रकार हैं। ‘फौजी की पाती’, ’रेलगाड़ी सुप्रसिद्ध रचनाएँ हैं। इन रचनाओं में गाँवों के जीवन का चित्रांकन है।

आद्याप्रसाद सिंह ‘प्रदीप’

ये पूर्वी अवधी के जाने माने कवि हैं। इनका जन्म २ अगस्त १९४५ ई. को सुल्तानपुर जिले के ग्राम रानेपुर दलिया गोलपुर में हुआ था। इनके पिता का नाम दुर्गाप्रसाद सिंह है। सम्प्रति ये जिलापरिषद के विद्यालय में अध्यापक है। ‘पूर्वी अवधी के कवियों’ पर इन्होंने पी-एच.डी. स्तर का शोध कार्य भी किया है। इनकी अवधी की रचनायें हैं – ‘अवध बानी’ (मुक्तक संकलन) इसे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। ‘सुलोचना’ खण्डकाव्य। ‘प्रदीप’ जी ने अवधी में सुन्दर गद्य भी लिखा है। पूरबी अवधी लोक गीतों की समीक्षा पूरबी अवधी के गद्य में ही करते हैं। इन्होंने लगभग एक दर्जन ग्रन्थों की रचना की है जिनमें कुछ प्रकाशित भी हो चुके हैं। राष्ट्रीय ऐक्य पर कवि के उद्गार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अवधी काव्य सृजन के प्रति समर्पित प्रदीप जी से हिन्दी जगत को बड़ी सम्भावनायें हैं।

आधुनिक अवधी काव्य में राष्ट्रीय चेतना

यह डॉ. अनीस हसन द्वारा सन् १९९० में प्रस्तुत शोध-प्रबंध है। इस शोध कार्य में आधुनिक अवधी काव्य के माध्यम से अभिव्यक्त राष्ट्रीय चेतना का उद्घाटन किया गया है।

आधुनिक अवधी काव्य में लोकतत्त्व

यह डॉ. शीलेन्द्र मोहिनी श्रीवास्तव द्वारा सन् १९७६ में प्रस्तुत शोध-प्रबंध है। इस शोध कार्य में अवध प्रदेश के जनजीवन में प्रचलित एवं परिव्याप्त लोकतत्वों को खोजने एवं उनकी विवेचना करने का प्रयास किया गया है।

आधुनिक अवधी के प्रमुख कवि

यह डॉ. ओम् प्रकाश त्रिवेदी द्वारा प्रणीत परिचयात्मक ग्रंथ है। इसका प्रणयन सं. २०४७ में हुआ। इसमें पं. प्रतापनारायण मिश्र, पढ़ीस, वंशीधर शुक्ल, रमई काका, मृगेश तथा पं. द्वारका प्रसाद मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला गया है।

आधुनिक अवधी संत-साहित्य

यह डॉ. रामकृष्ण जायसवाल द्वारा सन् १९९३ में प्रस्तुत शोध- प्रबंध है। इसमें अवधी भाषा के माध्यम से रचित संत-साहित्य का उल्लेख किया गया है।

आधुनिक काल में अवधी काव्य तथा उसके कवि

यह अवधी साहित्य का परिचयात्मक ग्रंथ है, जिनका संपादन-लेखन डॉ. दुर्गाशंकर मिश्र द्वारा सम्पन्न हुआ है। यह कृति सन् १९९५ में प्रकाशित हुई है। इसमें सैकड़ों आधुनिक अवधी कवियों का परिचय दिया गया है जिनका परिचय प्रायः अप्राप्त रहा है।

आधुनिक बैताल

आधुनिक रहीम के सदृश इनका अवधी काव्य भी बड़ा सरस और मनोरंजक है।

आधुनिक रहीम

ये अवधी में हास्य-विनोद और व्यंग्य के प्रमुख लेखक हैं। हिन्दी के पाठकों का इनके काव्य से बड़ा निकटस्थ परिचय है। इनका कोई काव्यग्रंथ अभी प्रकाशित नहीं हो पाया है फिर भी ये स्फुट काव्य लेखन में लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार हैं।

आधुनिक सूरदास

भक्तिकालीन महाकवि सूरदास ने ब्रजभाषा में अपने अमर काव्य की रचना की है, किंतु इन्होंने अवधी में काव्य रचना कर अपनी भावनाओं को समाज के बीच सम्प्रेषित किया है।

आनंदी दीन

ये आधुनिक काल के प्रतिनिधि अवधी कवि हैं। विशेष विवरण अनुपलब्ध है।

आनन्द प्रकाश अवस्थी आनन्द’ उर्फ नन्हें भइया

बैसवारी अवधी के श्रेष्ठ रचनाकार आनन्द प्रकाश अवस्थी ’आनन्द’ रायबरेली जिले के ग्राम चिलौली (इन्हौना) में सन् १९३९ ई. में जनमें थे। अभी ये राजकीय दीक्षा विद्यालय शिवगढ़ ‘रायबरेली’ में प्रशिक्षक पद पर कार्य कर रहे हैं। इनकी अवधी की प्रमुख काव्य-कृतियाँ इस प्रकार हैं:- ‘हियरा हँसे हमार’, ‘पैकरमा’, ’नींद अउते नहीं’, ‘देवी-पंचाष्टक’, ‘देवी अहोखा’, ‘जस-चालीस’ तथा ‘मन्दिरनामा’ आदि। आनन्द जी की रचनायें सरस हैं। उनमें ग्राम्य जीवन की संस्कृति रची-बसी है। राष्ट्रीय भावना- इनकी कविता का मुखरित स्वर है। इनकी कविता में सहजता है, आडम्बर शून्यता है। यहाँ भारत भूमि के प्रति स्तवन-भाव व्यक्त किया गया है। आधुनिक अवधी के विकास में कवि आनन्द से बड़ी सम्भावनायें हैं।

आलम

जनश्रुतियों के आधार पर कहा जाता है कि आलम धनाढ्य ब्राह्मण थे और जौनपुर निवासी थे। बाद में शेख रंगरेजिन के कारण मुसलमान हो गये थे। आलम का काव्य काल सं. १६४० से सं. १६८० के मध्य का है। आलम की प्रामाणिक चार रचनाएँ है:- (१) माधवानल कामकंदला (२) सुदामा चरित (३) स्याम सनेही (४) आलमकेलि। ‘माधवानल कामकंदला’ नामक रचना का निर्माण परिष्कृत अवधी में प्रबन्ध रूप में किया गया है। यह प्रेमपरक काव्य है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का इतिहास ( पृ. १९३) में आलम नाम के दो कवियों का उल्लेख किया है- एक अकबर कालीन ‘माधवानल-कामकंदला’ के प्रणेता और दूसरे ‘आलम केलि’ के प्रणेता। परन्तु कुछ विद्वानों एवं सुधी आलोचकों ने दोनों को एक ही माना है।

आल्हखण्ड

यह वीरगाथा काल के महाकवि जगनिक द्वारा प्रणीत अवधी का सर्वप्रथम काव्य-ग्रन्थ है। इसका प्रणयन सं. १२५० में हुआ। इसमें महोबे के वीर आल्हा-ऊदल की कथा है। इस ग्रन्थ को लिपिबद्ध करने का श्रेय सर चार्ल्स इलियट को प्राप्त है। उन्होंने इसे सन् १९६५ में फर्रुखाबाद जिले में लिपिबद्ध कराया था। यह श्रीरामचरितमानस के बाद अवध प्रदेश का सबसे लोकप्रिय ग्रन्थ है।

आल्हा

यह अवधी का महत्वपूर्ण छन्द है। भानु कवि कृत ‘छन्द प्रभाकर’ में इसके अन्य नाम हैं – वीर, अश्वावतारी, मात्रिक, सवैया। इनमें १६-१५ मात्राएँ होती हैं अंत में जगण होता है। ‘आल्हखण्ड’ की रचना इसी छंद में हुई है। दूसरे संदर्भ में आल्हा ‘आल्हखंड’ महाकाव्य के नायक एवं महोबा के वीर क्षत्रिय हैं। यह अवध और बुंदेलखण्ड की लोकप्रिय वीर गाथा भी है। पावस ऋतु में सामूहिक रूप से अथवा निजीस्तर पर इसका गायन प्रायः होता दिखता है। इसके मूलरूप के सम्बन्ध में अनेक विवाद हैं। जगनिक को आल्हखण्ड का रचयिता कहा गया है, पर उस अपभ्रंश-रचना का अवधी ‘आल्हा’ पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं परिलक्षित होता। वर्तमान आल्हा की अनेक लड़ाइयों के रचयिता प्रतापनारायण मिश्र को कहा जाता है। आल्हा के अनेक संस्करण हैं, जिनमें कहीं ५२ लड़ाइयाँ और कहीं ५६ लड़ाइयाँ वर्णित हैं। इसे आशुगायक प्रायः गढ़ते रहते हैं। इसमें अनुरणनात्मक ध्वनियों का बाहुल्य है। आल्हा के गायक अल्हैतों की पाठ प्रविधि स्वयं में विशिष्ट है।
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