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Definitional Dictionary of International Law (English-Hindi)(CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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SAARC (South Asian Association for Regional Cooperation)

दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन), सार्क
यह दक्षिण एशिया के सात देशों का एक क्षेत्रीय संगठन है। इसकी स्थापना सन् 1985 में की गई थी । इसके सदस्य – राज्य बंगला देश, भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव हैं । इसके शासनाध्यक्षों का प्रथम सम्मेलन सन् 1985 में ढाका मे हुआ था । इसका मुख्यालय काठमांडू में हैं ।
यह संगठन मुख्यतः एक गैर राजनीतिक संगठन है । इसका उद्देश्य सदस्य राज्यों के मध्य आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक आदान – प्रदान को प्रोत्साहन देना है ।
यह संगठन उत्तर – दक्षिण वार्तालाप में गतिरोध उत्पन्न होने के उपरांत उस भावना का संस्थात्मक निरूपण है जिसे प्रायः दक्षिण – दक्षिण सहयोग कहा जाता है ।

Sanctions

शास्त्रियाँ, प्रतिबंध
1. वे व्यवस्थाएं अथवा शक्तियाँ जो अंतर्राष्ट्रीय विधि को बाध्यकारी बनाने में सहायक होती हैं अर्थात जिनके कारण अंतर्राष्ट्रीय विधि की पालन किया जाता है ।
2. अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए एक राज्य या राज्य – समूह अथवा संगठन के द्वारा किसी अपचारी राज्य अथवा राज्य – समूह के विरूद्ध लगाए गए प्रतिबंध जो कूटनीतिक, आर्थिक, सैनिक कोई भी स्वरूप ले सकते हैं, जैसे शस्त्रों के निर्यात पर रोक, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पर रोक, व्यापारिक संबंधों पर प्रतिबंध, राजनयिक संबंधों का उच्छेदन आदि ।
राष्ट्र संघ की प्रसंविदा के अंतर्गत और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर मे भी अंतर्राष्ट्रीय शांति तता सुरक्षा बनाए रखने के लिए थथा अग्र आक्रमण का उत्त्र देने के लिए प्रतिबंधों विशेषकर आर्थिक प्रतिबंधों को, प्राथमिक उपचार के रूप में महत्व दिया गाय है ।

San Francisco Conference

सेनफ्रासिस्को सम्मेलन
यह सम्मेलन 25 अप्रैल 1945 से 26 जून, 1945 तक चला और इसमें 51 राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें भारत भी एक था । इसका मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के विधान को अंतिम रूप प्रदान करना था । सम्मेलन के समक्ष डम्बार्टन ओक्स में स्वीकृत प्रस्ताव थे जिनमें संयुक्त राष्ट्र क भावी संरचना निश्चित की गई थी । डम्बार्टन ओक्स प्रस्तावों पर सेनफ्रासिस्कों सम्मेलन में वाद -व वाद हुआ और अंत में उस प्रपत्र पर 50 राष्ट्रों के हस्ताक्षर हुए जिसे संयुक्त राष्ट्र का चार्टर कहा जाता है ।
यह उल्लेखनीय है कि सेनफ्रांसिस्को सम्मेलन ने डम्बार्टन ओक्स प्रस्तावों में अनेक महत्वपूर्ण संशोधन किए जैसे संयुक्त राष्र की महासभा के अधिकारों का प्रसार किया गया, मानव अधिकारों संबंधी अनेक प्रावधान डोड़े गए, न्यास पद्धति संबंधी प्रावधान जोड़े गे, आर्थिक और सामाजिक परिषद् को संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों में स्थआन दिया गया और क्षेत्रीय संगठनों संबंधी अनेक संशोधन किए गए ।
चार्टर पर 26 जून 1945 को 50 राज्यों ने हस्ताक्षर किए और 24 अक्तूबर, 1945 से आवश्यक संख्या में संपुष्टि पाकर वह लागू हुआ ।

school of monism

एकत्ववादी संप्रदाय,
अद्वैतवादी सिद्धांत
दे. Monistic theory.

sea bed treaty

समुद्र तल संधि
इस संधि का संपादन सन् 1971 में हुआ था । इसके अंतर्गत यह व्यवस्था की गई कि समदुर तल में नाभिकीय अस्त्रों का रखना वर्जित होगा । इसका पूरा नाम महासमुद्र और समुद्रतल पर नाभिकीय एवं अन्य जन – संहारक अस्त्रों को रखने पर निषएधकारी संधि है । इस संधि पर 10 फरवरी, 1971 से राज्यों ने हस्ताक्षर करना प्रारंभ किया । इस संधि के अंतर्गत कोई भी राज्य महासमुद्र तल में नाभिकीय अस्तर नहीं रख सकेगा । परंतु 12 मील के भूभागीय समुद्र तल के क्षेत्र में यह प्रतिबंध तटवर्ती राज्य पर लागू नहीं होगा ।

Secretary – General

महासचिव
संयुक्त राष्ट्र संघ के छह मुख्य अंगों मे से एक अंग सचिवालय है । सचिवालय का प्रधान महासचिव कहलाता है । महासचिव की नियुक्त सुरक्षा परिषद की संस्तुति पर महासभा द्वारा पाँच वर्ष के लिए की जाती है । चार्टर के अनुसार महासचिव संयुक्त राष्र संध का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी होता है । वह महासभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद और न्यास परिषद – सभी के मुख्य सचिव के रूप मे कार्य करता है और संगठन के कार्यसंबदी वार्षिक विवरण महासभा को प्रेषित करता है ।
महासचिव की स्थिति को महत्वपूर्ण बनाने में चार्टर का अनुच्छेद 99 निर्णायक सिद्ध हुआ है । इसमें कहा गया है कि महासचिव सुरक्षा परिषद् का ध्यान किसी भी ऐसे मामले की र आकर्षित कर सकता है जो उसके मतानुसार अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए संकटकारी हो ।
वास्तव में महासचिव की स्थिति बहुत कुछ उसेक अपने व्यक्तित्व और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है ।
नार्वे के ट्रिग्वेली संयुक्त राषअट्र संघ के प्रथम महासचिव चुने गए थे । इनके पश्चात क्रमशः डाग हैमरशोल्ड ऊ थान्त, कुर्त वाल्दहीम, पेरेज दि कुइयार और वर्तमान में मिस्र के बुतरस घाली इस पद पर विद्यामान हैं ।

secret clause

गुप्त खंड
दो अथवा अधइक राज्यों के मध्य संपन्न किसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते अथवा संधि का वह खंड जो पारस्परिक सुरक्षा अथवा किसी अन्य विशेष कारण, से गोपनीय या प्रकाशित रखा जाता है । संधिकर्त्ता राज्य इस प्रकार के खंड का उस समझौते अथवा संधि के अन्य खंडों के समान ही अनुपालन करने के लिए बाध्य होते हैं । अवसर आने पर संबंध राज्यों द्वारा गुप्त खंड का प्रकाशन किया जा सकता है ।

secret diplomacy

गुप्त राजनय
विभिन्न राज्यों द्वारा पारस्परिक स्वाथों की पूर्ति के लिए गोपनीय अथवा प्रच्छन्न रूप से अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं अथवा धि – वार्ताओं का संचालन करने की कला अथवा पद्धति । इस गुप्त कला अथवा पद्धति के अंतर्गत संबंध राज्यों द्वारा विभिन्न प्रकार की छलपूर्ण अथवा कपटपूर्ण प्रक्रियाओं, युक्तियों एवं कार्यपद्धतियों का प्रयोग भी किया जाता है ।
राष्ट्रपति बुश के शासनकाल में यह आरोप लगाया गया कि सं.रा. अमेरिका ने लेबनान से अमरीकी बंधकों को मुक्त कराने के लिए ईरान को गुप्त रूप से शस्त्रास्तर बेचे थे और यह धन निकारागुआ में स्थापित सरकार के विरूद्द कोन्ट्रा विद्रोहकारियों को सहायतार्थ भेजा गया था । इसे “यू. एस. ईरान कोन्ट्र डील” कहा जाता है ।

sector principle

क्षेत्रक सिद्धांत
अभिग्रहण के सातत्य और समीपता सिद्धांतों के अलावा एक तीसरा सिद्धांत जिसके द्वारा उत्तरी तथा दक्षिणा ध्रुवों के जनशून्य हिमाच्छादित प्रदेशों में विभिन्न राज्य अपनी स्थलीय सीमा और तटीस आधार रेखाओं से भूमंडल पर उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रवों तक खींची गई रेखाओं के भीतर ने वाले क्षेत्रकों पर, चाहे वह समुद्र हो अथवा भूमि अपनी प्रभुसत्ता का दावा करते हैं । इस दावे का आधार क्षेत्रक सिद्धआंत कहा जाता है । परंतु यह अंतर्राष्ट्रीय विदि में कोई मान्यता प्राप्त सिद्धांत कहा जाता है । परंतु यह अंतर्राष्ट्रीय विधि में कोई मान्यता प्राप्त सिद्धांत नहीं है । सोवियत संघ, वार्वे कनाडा और सं.रा. अमेरिका ने उत्ततरी ध्रुव के और चिली, अर्जेटांइना, ग्रेट ब्रिटेन ने दक्षिणी ध्रुव के वुभिन्न क्षेत्रकों (sectors) पर अपनी प्रभुस्त्ता का दावा किया है ।

Security Council

सुरक्षा परिषद
सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र संघ के छह प्रधान अंगों में से एक है । वास्तव में इसे इन प्रधान अंगों में भी सर्वप्रधान कहा जा सकता है क्योंकि चार्टर के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने का मूल दायित्व इसी अंग पर है । वस्तुतः सुरक्षा परिषद को एक प्रकार से संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यकारिणी परिषद कहा जा सकता है ।
सुरक्षा परिषद् मे इस समय कुल पंद्रह सदस्य हैं जिनमें रूप, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका इसके स्थायी सदस्य हैं । शेष दस सदस्य – राज्य दो वर्ष की अवधि के लिए महासभा द्वारा चुने जाते हैं । सन् 1965 से पहले इसकी सदस्य संख्या ग्यारह थी जिनमें पाँच स्थायी सदस्य और छह अस्थायी सदस्य होते थे ।
सुरक्षा परिषद की कार्यविधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसके द्वारा कोईभी निर्मय पाँचों स्थायी सदस्य – देशओं की सहमति के बिना नहीं लिया जा सकता अर्थात्यदि पाँचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक सदस्य किसी निर्णय के विरूद्ध मत देता है तब वह उसके द्वारा निर्णय का निषेध माना जाएगा और इसे उसका निषएधाधिकार (veto) कहा जाता है ।
यह उल्लेखनीय है कि निषेधाधिकार प्रक्रियात्मक प्रश्नों पर लागू नहीं होता । परंतु कोई प्रश्न प्रक्रायत्मक है अथवा नहीं, इसका निर्णय करने के लिए निषेधाधिकार का प्रयोग किया जा सकता है ।
किसी स्थायी सदस्य – राज्य द्वारा मतदान में भाग न लेना उसका निषएधाधिकार का प्रयोग नहीं माना जाता ।

security pact

सुरक्षा अनुबंद
दो या अधिक राज्यों के बीच ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संधि (या समझौता) जो उन राज्यों पर किसी शुत्रु राज्य द्वारा सशस्त्र आक्रमण किए जाने की स्थिति में, उन राज्यों को एक – दूसरे की सैनिक अन्यि प्रकार की सहायता प्रदान करने के लिए वचनब्दध करती है । बहुधा ऐसे अनेक समझौते क्षेत्रीय स्त्र पर हुए हैं जैसे नाटो, सीटो, वारसा संधि आदि । अंतर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से ये सामूहिक (आत्म) रक्षा के संगठनात्मक स्वरूप हैं ।

servitude

सुविधाभार
यह व्यवस्था मूलतः एक साम्राज्यवादी व्यवस्था थी जिसके अनुसार यूरोपीय साम्राज्यावादी राज्य एशियाई – अफ्रीका राज्यों में स्थानीय शसकों से संधियों अथवा समझौतों के द्वारा अपने नागरिकों तथा व्यापारियों के लिए विशेष सुविधाएँ या रियायतें प्राप्त कर लेते थे । इस प्रकार की सुविधाओं या रियायतों को सुविधाभार कहा जाता था । ये सुविधाएँ या रियायतें प्रायः स्थानीय स्वतंत्रता और क्षेत्राधिकार का खंडन करती थीं जैसे विदेशी नागरिकों का स्थआनीय नायायलय के क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त होना अथवा स्थानीय जल क्षेत्रों और भूभागीय समुद्र में विदेशियों को मछली पकड़ने का अधिकार दिया जाना अथवा विदेशी सेनाओं को पारगमन का अधिकार दिया जाना अथवा स्थानीय प्रदेश के किसी भाग के किलेबंदी करने पर प्रतिबंध लगाना आदि । यह उलेलेखनीय है कि अपनिवेशवाद के पतन के साथ इस प्रकार के संधि – मसझौते समाप्त हो गए हैं ।

sources of international law

अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोत
अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्त्रोत से तात्पर्य है वे पद्धतियाँ और प्रक्रियाएँ जिनके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार के नियम निरूपित होते हैं और क़ानूनी बल प्राप्त करते हैं ।
ओपेनहायम के मतानुसार अंतर्राष्ट्रीय विधि का एकमात्र स्रोत है राज्यों की पारस्परिक सहमति । साम्यवादी लेखक भी राज्यों की पारस्परिक सहमति को अंतर्राष्ट्रीय विधि का अनन्य स्रोत मानते आए हैं ।
ओपेनहायम के मतानुसार, चूँकि राज्यों की सहमति दो प्रकार से व्यक्त की जा सकती है, अतः अंतर्राष्ट्रीय विधि के दो स्रोत हैं । 1. संधइयाँ जो राज्यों की स्पष्ट सहमति को प्रत्यक्ष और स्पष्ट लिखित रूप से व्यक्त करती हैं और 2. प्रथाएँ जो राज्यों की सहमति के अलिखित, परोक्ष एवं अव्यक्त स्वरूप हैं ।
सन्म 1945 के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की संविधि के अनुच्छेद 38 के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया गया है । (1) प्रधान स्रोत और (2) सहायक स्रोत । प्रधान स्रोतों में संधियां, प्रथाएं और सभ्य राजयों द्वारा मान्यता प्राप्त विधि के सामान्य नियम सम्मिलित किए गए हैं । सहायक स्रोतों में न्यायिक निर्णय और विधिवेत्ताओं की रचनाएँ रखी गई हैं ।

South – East Asia Treatuy Organisation (SEATO)

दक्षिण – पूर्व एशिया संधि संगठन (सीटो)
सन् 1954 में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए जिसका लक्ष्य सदस्य – राज्यों में से किसी एक पर आक्रमण होने की दशा में सामूहिक रूप से उस आक्रमण का सामना करने के लिए इन राज्यों के वचनबद्ध करन था । इस संधि पर आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, फिलीपाइन्स, थाईलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका ने हस्ताक्षर किए थे ।
इस संधि की व्यवस्था को प्रभावकारी बनाने के लिए सन् 1955 मे एक संगठन की स्थापना की गई जिसे दक्षिण – पूर्व एशिया संधि संगठन कहते हैं ।
संधि का उद्देश्य दक्षिण – पूर्वी एशिया और दक्षिण – पश्चिमी प्रशांत महासागर के पूरे क्षेत्र में बाह्य आक्रमण अथवा आंतरिक विध्वंस की स्थिति मे सामूहिक रूप से रक्षात्मक कार्रवाई करना था । क विशेष प्रोटोकोल के अंतर्गत संधिगत क्षेत्र में कम्बोडिया लाओस और दक्षिणी वियतनाम की सुरक्षा को भी शामिल कर लिया गया ।
इस संगठन का मुख्यालय बैंकाक में था । परंतु अब यह संगठन वस्तुतः मृतप्राय है ।

South – South Dialogue

दक्षिण – दक्षिण संवाद
ब्रांट प्रतिवेदन से उत्साहित होकर और उत्तर – दक्षिण वार्ता में कोई प्रगति न देखकर, सन् 1982 में भारत क तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विकासशील देशों में से कुछ चुने हुए देशों की एक बैठक बुलाने का निश्चय किया । इस बैठक के दो उद्देश्य थे :-
1.तेल के मूल्यों में लगातार वृद्धि के कारण आयात की गई वस्तुओं, विशएषकर मशीनों के मूल्य में वृद्धि और इसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों के विदेशी मुद्रा भंडार का बराबर घटते जाना उनके व्यापारिक असंतुलन का लगातार बढ़ते जाना, विकासार्थ विदेशी सहायता का घटते जाना, श्रृणों का भार लगातार बढ़ते जाना, खाद्यान्नों में कमी आदि – इन सब प्रवृत्तियों के संदर्भ में उत्तर दक्षिण वार्ता से हटकर और उससे स्वतंत्र इन समस्याओं के समाधान के विष्य में विचार – विमर्श करना; और
2. उत्त्र – दक्षिण वार्ता विकसित और विकासशील राज्यों के पारस्परिक आर्थिक संबंधों अर्थात व्यापार, मुद्र, प्रौद्योगिकी स्थानांतरण, विकास – सहायता, की संभावनाओं और मुद्दों पर विचार करना ।
भारत का विचार केवल 27 देशों को इस सम्मेलन में आमंत्रित कनरे का था, किंतु यह संख्या बढ़कर 43 की हो गई । यह बैठक नई दिल्ली में 22- 25 फरवरी, 1982 तक चली ।
इस प्रकार विश्वव्यापी आर्थिक समस्याओं पर उस वार्ताक्रम का प्रारंभ हुआ जिसे प्रायः दक्षिण – दक्षिण संवाद कहा जाता हैं ।
इस घटना का एक परिणाम उस क्षेत्रीय संगठन की स्थापना है जिसे दक्षेस या सार्क काहा जाता है । परंतु दक्षिण – दक्षिण संवाद के फलस्वरूप विकासशील देशों के विकास के लिए पारस्परिक सहयोग एवं व्यापार की कोई व्यापक योजना प्रस्तुत नहीं हो सकी है । केवल द्विपक्षीय संभंधों में अधिक सहयोग और गतिविधियों प्रोत्साहन मिला है ।

sovereignty

संप्रभुता
राजनीति शास्त्र में संप्रभुता से तात्पर्य सर्वौच्च शक्ति से है । यह राज्य का अनिवार्य तत्व है और इसी कारण राज्यों को आपस में समान माना जाता है ।
संप्रभुता के दो पक्ष हैं – आंतरिक और बाह्य । अंतर्राष्ट्रीय विधि का संबंध संप्रभुता के बाह्य पक्ष से है जिसका अर्थ है कि राज्य अपने अंतर्राष्ट्री संबंधों के संचालन में पूर्ण रूप से शक्ति संपन्न और संवतंत्र है । किसी राज्य को कीस दूसरे राज्य के बाह्य संबंधों के संचालन में हस्त्क्षेप का अधिकार नही है । एक विवाचन के मामले मे स्विट्रज़रलैंड के न्यायाधीश मैक्स हयूबर ने लिखा था कि राष्टरों के पारस्परिक संबंधों में संप्रभुता का अर्थ है स्वतंत्रता अर्थात अपने बाह्य संबंधों के संचालन की स्वतंत्रता ।

space law

अंतरिक्ष विधि, अंतरिक्ष, क़ानून
1957 में सोवियत यान स्पूतनीक के अंतरिक्ष मे भेजे जाने से मानव प्रयास के एक नए क्षएत्र का द्वारा खुल गया जिसे बाह्य अंतरिक्ष कहा जाता है । तुरंत ही राज्यों के मध्य इस भावना ने जन्म लिया कि अंतरिक्ष के अंवेषण के लिए सभी राज्यों को समान अधइकार होना चाहिए और अंतरिक्ष अधाःस्थित राज्य के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार में नहीं होना चाहिए । इस भावना कोमूर्त रूप देने के लिए संयुक्त राष्ट्र की माहासबा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें अंतरिक्ष को महा समुद्रों के समान सामुदायिक प्रदेश घोषित किया गया और अंतरिक्ष की व्यवस्था संबंधी सिद्धांतों का भी निरूपण किया गया । 1967 में इन सिद्धांतों को वैधानिक रूप देने के उद्देश्य से एक संधि हुई जिसे संक्षेप मे अंतरिक्ष संधि कहते हैं । इस संधि से उस नियमावली का प्रारंभ होता है जिसे अंतरिक्ष विधि कहा जाता है । अगले वर्ष अर्तात 1968 में अंतरिक्ष यात्रियों की सहायता, उनकी वापसी तथा अंतरिक्ष में प्रक्षेपित वस्तुओं के संबंध में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए । इस समझौते में यह काह गया कि अंतरिक्ष यात्रियों को तरिक्ष में मानव जाति के दूत समझा जाना चाहिए और उनके विपदाग्रस्त होने की दशा मे सभी राज्यों को उनकी सहायता करने के लिए तत्पर रहना चाहिए । फिर 1972 में एक अन्य अनुबंध पर हस्ताक्षर हुए जिसमें अंतरिक्ष में प्रक्षेपित वस्तुओं से हुई हानि के लिए प्रक्षेपक राज्य के अंतर्राष्ट्रीय दायित्व की व्यवस्था की गई ।
इस संधि व समझौतों और ग घोषणापत्रों के समूह को अंतरिक्ष विधि कहा जा सकता है । यह7 विधि पिछले 35 वर्षों के विकास का प्रतिफल है और यह अभी भी वाकसमान है ।

space treaty

अन्तरिक्ष संधि
दे. Space law.

specific adoption theory

विशिष्ट अंगीकरण सिद्धांत
स्टार्क आदि लेकखों का मत है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि के नियमों को निर्धारित राष्टरीय प्रक्रिया के द्वारा अंगीकार करके अर्थात् इनको राष्ट्रीय विधि में विधिवत् अंगीकार करके ही इन्हें राष्ट्रीय विधि का भाग बनाया जा सकता है ।

sphere of influence

प्रभाव – क्षेत्र
उन्नीसवीं शताब्दी मे जब यूरोप के अनेक देश अपने साम्राज्य का प्रसार करने और नए – नए उपनिवेशों की खोज करने में संलग्न थे तब उनके मध्य इस भावना ने जन्म लिया कि इस प्रक्रिया में अनावश्यक प्रतिद्वांद्विता और संघर्ष से बचा जाए और संसार के अनेक क्षेत्रों को निर्धारित कर दिया जाए जहाँ प्रभुत्व प्रस्थापित करने का निर्धारित राज्य को वरीयता के आधार पर अधिकार हो । इस तरह से विभिन्न राज्यों के कुछ क्षेत्र निर्धारित हो गए जिन्हें उनका प्रभाव – क्षेत्र कहा जाने लगा और जिसमें किसी अन्य राज्य का हस्तक्षेप राजनीतिक दृष्टि से अनुचित समझा जाने लगा ।
दूसेर महायुद्ध में इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ते हुए सोवियत संघ और पश्चिमी राष्ट्रों के पारस्परिक प्रबाव – क्षेत्र भी वस्तुतः निर्धारित हो गए जिन्हें माल्टा समझौते (1944) ने भी मान्यता दी ।
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