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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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हार्धकला

हकार की अर्धकला अथवा हार्धकला योनिरूप में कल्पित है। यह अतिरहस्यमय गुह्य तत्त्व है। शिव और शक्ति के मिलन से उत्पन्न अमृत की धारा के प्रवाहित होने पर उससे जिस लीलामय तरंग की उत्पत्ति होती है, वही तान्त्रिक परिभाषा में हार्धकला के नाम से विख्यात है (शाक्त दृष्टि, पृ. 78)।
हार्धकला का नित्याशोडषिकार्णव (1/186) में सपरार्ध कला के रूप में वर्णन है। सकार से आगे हकार की स्थिति है। उस हकार के अर्धभाग को सपरार्ध अथवा हार्ध कहा जाता है। तन्त्रशास्त्र में बीजाक्षर ईकार कामकला का प्रतीक है। ब्राह्मी लिपि में इसका आकार कामकला के तीन बिंदुओं को और अनच्क हकार के अर्धभाग को मिलाकर बनता है। इस हकार के अर्धभाग सदृश मात्रा की स्थिति बीजाक्षर में बिंदु के समीप उपर रहती है, किंतु कामकला का ध्यान करते समयइस अनच्क हकारार्ध की स्थिति बिन्दुद्वय के नीचे अधोमुख रहता है। इसका रहस्य गुरुमुख से ही जाना जा सकता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

हिरण्मय पुरुष

सूर्य मंडलस्थ परमात्मा हिरण्मय पुरुष हैं। इसे “योSयमादित्ये ज्योतिषि हिरण्मयः पुरुषः” इत्यादि श्रुति द्वारा प्रतिपादित किया गया है। यह हिरण्मय पुरुष परमात्मा का प्रतीक रूप है (अ.भा.पृ. 221)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

हिंसा

अन्य को पीडित करना अथवा पीड़ा देने की इच्छा होना हिंसा है। हिंसा-कर्म की अपेक्षा हिंसा का मानस रूप (इच्छा-रूप) अधिक दूषित है (अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि में)। केवल पीड़ा देना ही नहीं, अन्य को पीड़ित कर अपने को आनन्दित या सुखी करने का मनोभाव हिंसा के साथ युक्त रहता है। यह मनोभाव मूलतः द्वेषरूप क्लेश के कारण होता है। क्लेश चूकि अज्ञान है, इसलिए आत्मज्ञान के विकास के साथ-साथ हिंसावृत्ति क्रमशः नष्ट होती है। व्यवहारतः हिंसा लोभ, क्रोध और मोह पूर्वक होती है। यह हिंसा कृत होती है, कारित (दूसरों के द्वारा करवाई हुई) होती है तथा अनुमोदित (किसी के द्वारा प्रोत्साहित) भी होती है। संस्कारबल के अनुसार हिंसा मृदु, मध्य और तीव्र भी होती है। इस प्रकार हिंसा के 27 (= 3x3x3) भेद होते हैं। मृदु आदि के भी अवान्तर भेदों के अनुसार हिंसा के भेद बहुसंख्यक होते हैं – यह पूर्वाचार्यों ने दिखाया है। ऐसी मान्यता है कि हिंसाकारी व्यक्ति जीवित-अवस्था में नाना प्रकार के दुःख को भोगते रहते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हेतुवाद

योगसूत्र 2/15 के व्यासभाष्य में इस वाद की चर्चा है दुःखःहानकारी आत्मा (जो ‘हाता’ है) का स्वरूप हेय (= अपलाप करने योग्य) नहीं हो सकता और न उसका स्वरूप उपादेय (= उपादान के योग्य) ही होता है। उपादान अर्थात् कार्यकारणरूप में आने पर आत्मा में परिणाम स्वीकार करना होगा और इस प्रकार कभी भी परिणामहीन मोक्ष नहीं हो सकेगा, क्योंकि जो कार्य होता है, वह विनाशी होता है। यह दृष्टि ही हेतुवाद है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हेय

हेय = त्याज्य। योगशास्त्र में अनागत दुःख ही ‘हेय’ शब्द से लक्षित होता है (योगसू. 2/16)। अतीत दुःख चूंकि उपभुक्त हो चुका है, अतः वह ‘हेय’ नहीं हो सकता; वर्तमान काल (जो वस्तुतः क्षणमात्र है) में जो दुःख अनुभूत हो रहा है, उसका परिहार अशक्य है; अतः अनागत दुःख ही ऐसा है जिसका परिहार किया जा सकता है। ‘हेय’ कहने का अभिप्राय यह है कि उसका परिहार सम्यक् दर्शन के द्वारा किया जा सकता है। दूरदर्शी योगी में अनागत दुःख भी क्लेशदायक के रूप में प्रतिभात होता है। चूंकि दुःख का जन्म के साथ अविनाभाव संबंध है, अतः योगी की दृष्टि में भविष्यत् जन्म ही हेय है, जिसके निरोध के लिए तत्त्वज्ञान का अभ्यास योगी करते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हेयहेतु

योगशास्त्र की दृष्टि में अनागत दुःख हेय है (योगसू. 2/16); अतः अनागत दुःख का जो हेतु है वह हेयहेतु है। द्रष्टा एवं दृश्य का जो संयोग है, वही अनागत दुःख रूप हेय का हेतु है – यह योगसूत्र 2/17 में कहा गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

होम

शैवी साधना में त्रिक आचार के ज्ञानयोग का वह प्रकार जिसमें साधक को भावना द्वारा यह विमर्श करना होता है कि संपूर्ण विश्व परमेश्वर में उसी के रूप में रहता है; वस्तुतः यह समस्त भावरूप जगत् परमेश्वर में उसकी संवित् के ही रूप में चमकता रहता है। परंतु इस प्रकार के शुद्ध विकल्प को अपने चित्त में रूढ़ करने के लिए सतत अभ्यास से संपूर्ण सूक्ष्म एवं स्थूल भावों तथा पदार्थ को भावना द्वारा परमेश्वर के संवित रूप तेज में अर्पित करते हुए सभी कुछ का केवल संवित् के ही रूप में विमर्श करना होता है। इसी को ज्ञानयोग का होम कहते हैं। (तन्त्र सार पृ. 260)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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